Sunday, 16 February 2014

तपश्चर्या

एक मैं ही नही 
अनादि ब्रह्म भी तप रहा है 
तुम्हारे फन में 
दोपहर की तरह 
ढलता मैं 
किवाड़ो को खोल कर 
तुम्हारे पास से आने वाले 
हवा की प्रतीक्षा में 
कब से खड़ा हूँ 
दुनिया की इस पुरानी 
हवेली में। 
कितनी बरसातों 
कितने भीतो 
वर्षो के बाद 
तुम्हारे नेत्रों में आई 
थोड़ी सी अपने लिए 
चमक देखने के लिए 
कब से ज्वार भांट की तरह 
लहर रहा हूँ-विराट सागर में 
कि तुम किसी पूर्ण मासी की रात में 
सम्पूर्ण उतरोगे 
आसक्ति के मेरे 
समूचे जल में। 


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