Sunday, 16 February 2014

मित्र

ज्यादातर मित्र मिले 
बिछड़ गये 
वे अपने प्रभाव अंकित करते रहे 
हम कागज की तरह छपते रहे 
एक प्रेस की तरह जीवन 
हमें एक पत्र की तरह निकालता रहा 
हर एक दिन। 
लोगों ने पढ़ा हमें 
और जाना हमारे मित्रों को। 

गये हुए दिन

गये दिनों की 
स्मृतियाँ हैं 
अनेक सुन्दर साहचर्यों की 
सुगन्धित वासनाएँ !
गये दिन 
रह गये दिनों को कोसते हैं 
और देह से मन से 
आदिम वृक्ष के पत्ते 
कुछ और झर जाते हैं। 

तीन मुक्तक

१ प्रेम :
पीठ पर नागिन लिटाए ,
जा रही है दूर हम से शाम.
आँख आंचल से बंधी है ,
और अधरों पर उसी का नाम.

२ पाती :
यह उदासी जेब में थी ,
हाथ में आई.
बांचने को मन हुआ ,
पर आँख भर आई.

३ चाँदनी 
चंचल मन चांदनी हजार नहीं होती है ,
आँखों में चितवन की धार नहीं होती है.
रूप के बटोही थे, साथ चले आए थे ,
वरना अब मौसमी बहार कहां होती है !

तपश्चर्या

एक मैं ही नही 
अनादि ब्रह्म भी तप रहा है 
तुम्हारे फन में 
दोपहर की तरह 
ढलता मैं 
किवाड़ो को खोल कर 
तुम्हारे पास से आने वाले 
हवा की प्रतीक्षा में 
कब से खड़ा हूँ 
दुनिया की इस पुरानी 
हवेली में। 
कितनी बरसातों 
कितने भीतो 
वर्षो के बाद 
तुम्हारे नेत्रों में आई 
थोड़ी सी अपने लिए 
चमक देखने के लिए 
कब से ज्वार भांट की तरह 
लहर रहा हूँ-विराट सागर में 
कि तुम किसी पूर्ण मासी की रात में 
सम्पूर्ण उतरोगे 
आसक्ति के मेरे 
समूचे जल में। 


भेंट होने पर

भेंट होने पर 
फूल खिल जाते हैं 
गंध मिल जाती है,
तन प्रफुल्लित। 
न भेंट हो 
तो सब कुछ उदास-उदास 
खोया-खोया लगता है,
तुम्हारे देह में क्या 
स्त्री के अतिरिक्त कुछ है,
जो मेरे प्राणों को 
हरा रखता है 
परमात्मा सा। 

Monday, 3 February 2014

बाहर निकलो

बाहर निकलो मेरे दोस्त 
समय धूप हवा पानी सा 
शहरो व गॉँवो के पेट में 
समाया है ,
भूख प्यास तृष्णा या कामना 
कितने ही रूपों में 
यहाँ वहाँ मैंने उसे 
मुँह बाये खड़ा पाया है। 
क्या करोगे तुम 
डँसने को प्रयत्न्शील नाग का 
क्या करोगे इस 
लगी हुई चौतरफा आग का ?

स्त्री

हजार आँखों वाली होती है स्त्री 
एक भेंट में 
तुम देख सकते हो 
उसकी दो आँखें 
दूसरी और तीसरी 
चौथी और पांचवी 
मुलाकातें 
यदि तुम्हारी होती गयी 
और यदि तुमने देखना जारी रखा 
तो हजार आँखे 
तुम्हे दिख जायेंगी 
किसी भी स्त्री की।  
पुरुषोत्तम  
सहस्त्रवाहु हो सकते हैं 
पर स्त्री हमेशा 
हजार आँखो वाली है 
इंद्राणी। 

देखिये

देखिये यह रात 
कैसे बीतती है 
दिन बिताना नही पड़ता 
रात के संग 
बात वैसी नही होती। 
देखिये यह लाश है 
इसे ढोना बहुत मुश्किल है 
जिंदगी के संग 
वैसी बात प्रायः नही होती। 
देखिये 
यह बात 
दर्शन की नहीं 
रोटी-नमक की है 
गजल, गीतो की नहीं 
इसको न ले और बातों की तरह 
और बातों की तरह 
यह बात शायद नही। 

अव्याकरण

न कोई इच्छा है 
न आकांक्षा 
न प्रेम 
न प्रतीक्षा 
पर अपरचित सा तुम्हारा 
मौन रहना 
सालता है। 
तुम हजारो मील मुझसे दूर रहकर क्या करोगी 
एक क्षण भी मिलोगी तो 
निपट मेरा कहीं होना 
गहन तुमको कहीं बिठा देगा 
मुझे तुमसे कुछ नहीं कहना 
सिवा इसके 
तुम मुझे भी देखकर 
सामान्य रहना सीख लो 
हमारे लिए इतना 
और कर दो 
जिस तरह तुम रह लिया करती हो खुश-खुश 
नहीं मिलने पर 
उस तरह 
तुम देख कर भी खुश रहा करो। 

मेरे भीतर

मेरे भीतर सागर गाता है 
हाहाकार नहीं है यह 
आत्मा का शोर उठा करता है 
शत-शत तरंग 
शत-शत घूर्णन 
सूरज को 
चन्द्रमा को 
पास बुलाता है। 
भीतर सब इन्द्रियाँ 
मछलियों सी दौड़ लगाये हैं 
जाने कितने रत्न छिपे हैं 
जाने कितने अभूतघर 
कितने विष के स्रोत 
मेरे भीतर सभी देवता 
सभी राक्षस 
मिलकर मंथन करते रहते हैं
विष्णु बांटते हैं अमृत 
शंकर विष पी जाता है। 

चेहरा चेहरा खिल जाय

चेहरा चेहरा फूल खिले 
तो मन को शान्ति मिले। 

मलिन उदासी हर जाय 
तो मन को शांति मिले। 

भूखे को भोजन मिल जाय 
रोगी को उपचार 
किसी दिगंबर का कपड़ा सिल जाय 
तो शान्ति मिले। 

दुखी दीन के घर में भी 
यदि महक उठे भोजन की 
पल्लिक प्रेसों पर भी 
यदि सुविधा सम्मान मिले। 

देहाती से भी कोई यदि 
ठाट-बाट का दे दे न्योता 
मधुर भाव से बाते करे 
तो मन को शान्ति मिले 

हवा, दूध, पानी, पथ 
प्राणी-प्राणी प्राप्त करे 
खाना का सामान सभी को 
श्रम से सुलभ रहे 
ऊँच-नीच का भेद मिटे 
तो मन को शान्ति मिले 

जागरण : निः शब्द

जागे कौतूहल 
छल-छल-छल भर आये 
नेत्रों में जल। 
रूप प्यासे 
हो रुआँसे 
कहाँ संध्या हम बिता आये 
चुप हुए हम खोजते अपनी जगह 
वृक्ष सोये से लगे 
धरा फैली बहुत व्यापक 
दिष्टि ओछी 
कहाँ से समाये नम 
खोलता हूँ पृष्ठ मैं 
मन की किताबों का 
बंद करता हूँ 
नहीं कोई शक 
हिलता सास लेता। 
यह जागरण निः शब्द 

Sunday, 2 February 2014

रह गए अन्तः करण में

मैंने मोगरे का फूल नहीं देखा 
उसे मैंने ओठों की तरह 
प्रेम की किताबों में देखा है 
मैंने गुलाब के फूल देखे हैं 
तुम्हारे ओठों की तरह 
मुस्कुराते हुए फिर 
आखों से झरते हुए 
पढ़े हुए 
देखे हुए 
दोनों ही फूल थे 
देखे गए 
पढ़े गए 
झर गए 
रह गए तो केवल तुम्हारे ऒठ 
अन्तः करण में 
प्रतीक्षित चुम्बन की तरह। 

चिंता मुझे उनकी है

अपनी ही बनायी दुनिया 
घेरती है चारो ओर से 
लगाती है कांटे नागफनी 
ऊँची चहारदीवारी 
जड़ती  है सीसे 
गेट बनाकर 
हथियार बंद संतरी बैठा देती है। 
भागोगे तो कैसे तुम 
अपाहिज पहले कर रखा है उसने 
टुकुर-टुकुर देखो 
घेरे में बैठकर आकाश 
घेरे के अंदर 
लगे पेड़ पौधे 
फूल पत्ते
रंग बदरंग होते इट पत्थर। 
मेरा तो जीवन पहले से ही आकाश था 
भविष्य में भी आकाश रहेगा 
चिंता उनकी है 
जो उगा रहे हैं नागफनी 
घेरे लगा रहे हैं यथाशक्ति 
सबको 
अपना समय इसी बंधन को 
किये जा रहे हैं समर्पित।   

यह भी एक बसंत है

यह भी एक बसंत है 
कि द्वार-द्वार पर 
लटक रहे हैं ताले 
शहर कहीं और घूमने चला गया है 
लौटकर पूछता हूँ 
शहर, घर और मित्रों का पता 
कोई ठिकाना बताता नहीं 
एक कुत्ता राह में पड़ा है ,
एक औरत कूड़ा फेंक कर जा रही है 
लोग है भी और नहीं भी 
यह कैसा बसंत है 
कि बतास गायब है 
पर है यह बसंत ही 
कि उसके लक्षण खोज रहा हूँ मैं। 

प्रेम कहानी

जो रह नहीं गयी 
वह उपेक्षा थी 
आँख खोलने वाली 
यद्यपि उसे कानों ने सुना था 
जैसे आकाश सुनता है समुद्र को 
और कुछ और दूर हो जाता है 
मैंने सुना था 
मैं आकाश की तरह दूर हो गया 
जैसे हर कहानी का अंत होता है 
उसी तरह मेरी कहानी का अंत हुआ 
अब यह कहने की जरुरत नहीं 
कि यह भी एक प्रेम कहानी थी। 

किसान

किसान ने बादल की तरफ देखा 
वे चले गये थे 
किसान ने धरती की ओर देखा 
वह सूख रही थी 
बेटे की ओर देखा 
वह बे रोजगार था 
पत्नी की ओर देखा 
उसकी साड़ी फटी हुई थी 
जेब की ओर हाथ बढ़ाया 
उसमे दो रुपये थे 
घर में देखा 
बर्तन, कुछ अनाज 
कुछ कंडे, उपले लकड़ियों का ढेर। 
किसान ने सोचा 
नमक है
तो भोजन का उपाय है 
और ,और , और 
और तो कुछ भी नही है 
किसान के पास 
क्या किसान को किसी 
और देश में होना चाहिए।  

कथरी

वह चौराहे पर मिल गया 
हड़बड़ी में था 
उसके थैले में क्या था 
मैंने पूछा नही ,
उसने कहा 
दोस्त, बहुत मुश्किल में हूँ 
दाल अट्ठारह रुपये 
तेल छत्तीस रुपये 
आटा तीन रुपये 
तनख्वाह बारह सौ रुपये 
मकान भाड़ा चार सौ 
कैसे चलेगा ?
मैंने कहा मैं भी मुश्किल में हूँ 
तनख्वाह छः हजार रुपये 
इनकम टैक्स एक हजार रुपये 
बिमा, पी.एफ. कटौतियां 
हाथ में आता तीन हजार रुपये 
मकान भाड़ा एक हजार रुपये 
बचता दो हजार रुपये 
जीने का खर्च बढ़ा 
रुपये का मूल्य घटा ,
दोनों की कथरी खुली 
दोनों ने एक दूसरे के सामने 
अपना-अपना कम्बल झाड़ दिया,
हमने साथ-साथ चाय पिये 
पान खाये 
अलग-अलग दिशाओ में चले गये ,
क्या हम लोग कथरी सीते रहेंगे 
कौन है वो जो कालीन बिछाते हैं 
वे कौन सा धंधा अपनाते हैं। 

शशि प्रभा

तुम देर से आयी दुनिया में 
देर से मिली 
देर से खिली 
नहीं तो मैं तुम्हे प्यार करता 
तुम्हारी खनकदार हंसी को 
तुमसे रोज थोड़ा-थोड़ा मांग लेता 
बंद करता जाता 
दिल की तिजोरी में 
कि वे प्यार के खजाने बनते जाते
जिंदगी के तालाब में 
मछली की तरह 
तुम होती 
जल होता 
लहर होती 
कलकल होता। 
तुमने देर कर दी शशि प्रभा 
देर कर दी। 

तुम चुप थी

तुम चुप थी 
तुम्हारे सवाल में 
पर चुप्पी न थी 
वह एक और सवाल के लिए 
सवाल था ,
मैं उसका जवाब था 
मैं चुप था 
कि तुम सवाल के लिए 
कोई सवाल न करो ,
तुम चुप थी 
कि मैं कोई जवाब न 
बनूँ। 

वह स्त्री

वह स्त्री 
अपने पति के लिए 
प्यार नहीं देह सजाती है 
अच्छा है उसका प्यार 
पति परमेश्वर की इच्छानुसार 
वह सजती है सवरती है। 
वह स्त्री 
प्यार की प्रतीक्षा करती-करती 
बूढ़ी -बूढ़ी  होती जाती है 
उसका पति 
उसकी इच्छा की 
परीक्षा लेना चाहता है 
शायद ?

गरीब आदमी की चिंता

सुबह-सुबह 
चाय की चिंता 
घर में कुहराम की चिंता 
आ गए हित-नात की चिंता 
बढ़ रहे कर्ज की चिंता
बेटे की रोजगार की चिंता 
बेटी के ब्याह की चिंता 
गिर रही दीवार की चिंता 
पेड़ नहीं छतनार की चिंता
छोटी-छोटी इच्छाएँ 
छोटी-छोटी बातें 
प्यार भी दाल-रोटी की तरह 
उसे भी बनाये रहने की चिंता। 
बड़े लोग मिल गए 
तो हसने की विवशता 
अपने से भी गरीबों को देखकर 
कुछ ज्यादा घबड़ाये रहने की चिंता 
देश की खबर में अपनी खबर 
कभी न मिलने की चिंता। 

सपना सच मानती है औरत

वह औरत सपने में रहती है 
कभी भी कर लेती है 
आँखे बंद ,
सपने में यार से मिलती है 
बिछुड़ती है। 
सपने के बाहर एक भीतरी दुनिया है 
उसके यार भी हैं 
रिश्तेदार भी 
वह उनसे न मिलती है 
न बातें करती है। 


अहैतुक

दिए बिना रहा नही जाता 
सम्पूर्ण दिए बिना !
क्यों कि कुछ ही शेष रह जाय 
तो देना रस नही बनता 
कोई समूर्ण नही घटता !
जैसे बीज बिना मिटे नही बनता वृक्ष 
और वृक्ष बिना माहलाहित हुए 
नही बनता प्रसून !
वे स्वीकारे न स्वीकारे !
जो जानते हैं रहस्य जीवन का 
वे मिटेंगे सम्पूर्ण 
वृक्ष बनेंगे 
रंग विरंगे फूलों से सिलेंगे 
सृष्टि के नयनों की आगवानी 
हमेशा-हमेशा करेगें। 

प्रिय जन जब बिछुड़ते हैं

प्रिय जन जब बिछुड़ते हैं 
जीवन के घर बाहर छोड़ जाते हैं 
अपने अस्तित्व के टुकड़े 
कभी आधा चेहरा 
कभी कोई आधा अधूरा शरीर 
राह में 
घर में 
दूकान में 
कभी उनकी हँसी 
कभी बालो की सेटिंग 
कभी कोई तकिया कलाम ,
गैर सिलसिलेवार उनकी 
स्मृति के खंड-खंड 
चुप उदास करते जीवन की 
छाया में घुल-मिल जाते हैं ,
मृत्यु को प्राप्त 
आत्मीय मनुष्य 
कितने वजनी हो जाते हैं 
सोच कर डर भी लगता है ,पर साथ-साथ 
होती है आत्मा के किसी कोने में 
एक शाश्वत ख़ुशी कि 
हमारे बाद भी लोग जियेंगे 
और इसी तरह लोगो को याद करेंगे 
मरने से पूर्व। 

लक्षण

बच्चे यदि बच गए हैं 
तो धन्यभाग 
बूढ़ों का त्रिकाल अंत 
होते रहना चाहिए। 
नित्य प्रातः हिले, डुले पत्ते 
बोले पखेरू 
उगे सूरज 
होता रहे अंकुरण 
बचते रहे बच्चे 
तो शताब्दियों तक जीवन सुरक्षित मानना। 
और यदि बूढ़े ही बूढ़े 
टहलते रहे सड़कों पर 
हिलाते हुए लकड़ी सिद्धांतों की 
तो जानना मेरे उत्तरवर्तियों 
अब सूर्य नहीं उगेगा 
और शताब्दियों का अंत होने वाला है। 

चेहरों का गुलाब

वह चेहरा 
एक दूसरा गुलाब न था 
वह, वह हो सकता था 
काश, उसे खिलने दिया जाता। 
मैंने माली से पूछा 
क्यों नहीं देते खिलने 
उस गुलाब को 
माली चेहरे को गुलाब नही मानता 
हंसता है, इतने गुलाब खिले हैं 
एक अनखिला रह जाये 
तो क्या फर्क पड़ता है। 

मेरी माँ

मेरी माँ बड़े सुबह जागती है 
उसको अर्से से पता है कि 
एक बार कम से कम ईश्वर का नाम लेना चाहिए ,
घर आगन बहारती है 
बहू बेटी की चिंता में दक्ष 
मेरी माँ बर्तन धोती 
खटिया बिछाती है ,
बूढी होने के एहसास से हजारो शब्द दूर 
मेरे बड़े होने की छाया से प्रसन्न 
मेरी तनख्वाह से बहुत थोड़े रुपये की 
कामना रखती है ,
यों इसी तरह जीते-जीते 
वह मेरे लिए अपनी मौत छोड़ जाना चाहती है ,
हिन्दू होने की लाज मुझे है 
वह जानती है ,
जानती है अदा करूँगा धार्मिक कृत्य 
जो उसे मुक्त कर देगी 
मेरी माँ एशिया की बूढी नदियों सी 
कामधेनु रही है। 
चाहता हूँ कुछ करना उसके लिए 
जाड़े में एक गर्म कपड़ा 
धूप में एक फोल्डिंग चारपाई 
उसे देना चाहता हूँ ,
कहाँ दे सका 
मैं ही क्यों 
मैं अपने पुरखों को जानता हूँ 
वे भी नहीं दे सके हैं अपनी माताओं को ,
यों माँ प्रसन्न है कि मैं उसका पुत्र हूँ 
मैं प्रसन्न हूँ कि वह मेरी माँ है।   

माँ और बच्चा

बच्चा माँ की गोद में 
मौज से बैठा है। 
माँ के लिए ख़ुशी है 
बच्चे का भविष्य 
और बच्चे के लिए 
माँ का वर्तमान 
दोनों की ख़ुशी में 
खुश है 
दोनों का जहान। 


यह दुपहरी

यह दुपहरी 
तुम हमारे पास आ जाओ 
तो हो जाये सुनहरी 
अन्यथा चुप है ,
तुम्हे शायद चाहती है 
पास में 
यह दुपहरी 
दिख रही है 
बाहर सड़क तक 
भागते हैं लोग जैसे 
छोड़ कर चले जाने के लिए 
जिंदगी का नरक ,
यह दुपहरी है 
मुझे आवाज देकर 
पास आई है 
और अपने साथ 
गौरैया मिहनती 
पकड़ लायी है ,
व्यस्त गौरैया
फुदकती है चटकती है 
तुम इसी बेला चले आते तो 
लग जाती कचहरी। 

Friday, 31 January 2014

एक अदना दिया जला-जला जाय

दिल तो अक्सर बुझा बुझा जाय 
एक अदना दिया जला जला जाय 
गम है, रात है, खामोशी भी 
कोई परी हिला हिला जाय 
कोई पक्षी गुरेज से बोले 
कोई नन्ही सी शाख हिल जाय 
आ गये हम कहीं समन्दर में 
संगम बाहर हुयी हुयी जाय 
अबकी मिलते हैं फिर मिले ना मिले 
दो घडी साथ रह अलग जायें 
आस्तीनों में साँप पहले थे 
आज सीने में वे निकल आये 
यह हवा उस हवा से बेहतर है 
काश ! आबो हवा बदल जाये 
झूठ सच क्या है यह खुदा जाने 
कौन से घाट आदमी जाये। 


बी.डी.एन शाही की मृत्यु पर

क्यों जल्दी ही मार दिया जाता है 
अन्याय से लड़ता हुआ आदमी 
और वह तो शब्दों से लड़ रहा था 
दुश्मन को मारने के लिए नहीं 
उसकी आत्मा को जगाने के लिए 
दुश्मन क्यों नहीं चाहता की 
उसकी आत्मा जगे 
उसकी नींद टूटे 
क्योंकि दुश्मन अपने को अपना 
दुश्मन नहीं देखना चाहता 
वह मारा गया 
जल्दी ही मार दिया गया 
क्यों कि ईश्वर उसके दुश्मनो के पक्ष में था 
और ईश्वर हमेशा भक्त वत्सल रहा है। 
दुश्मन और ईश्वर दोनों नहीं जानते कि 
उसकी शब्दावली हमेशा बची रहती है 
जो अन्याय से लड़ती जबान बोलता है,
आत्मा को लगता है 
गलत आदमी की देह में 
सही आत्मा के फूल खिलाता है। 
वह जिन्दा रहता है शताब्दियों तक 
मरता, मार खाता आदमी ऐसा वह 
हमेशा अमर रहता है 
वह नही मरता जैसे ईश्वर मर जाता है 
अपने भक्तो के साथ-साथ। 

उदासी

उदास तो तिनका भी था 
पर चुप था 
हवा में हिल रहा था 
मेरे मन से मगर मिल रहा था 
उदास शाम भी 
अकेली पथराई आँखों से 
बादल के टुकड़े देख रही थी 
पर मुझसे मिलने के पहले 
कुछ कम उदास थी,
यह उदासी किसी खेत के सिवान पर 
मेरे साथ मेरे जन्म के साथ पैदा हुई 
बढ़ी और अब अधेड़ हो गयी है,
आज की शाम मैंने उसे 
दर्पण में नहीं पानी में देखा 
और जानना चाहा पहली बार 
कि कौन-कौन उदास है,
उनको मैं प्यार कर पाऊँ बेहद 
क्यों कि उनमे से किसी के द्वारा ही 
तिनके की, शाम की उदासी 
हंसी में शामिल होगी।  

प्रार्थना

भोर हुई तो उगी प्रार्थना 
अब न करूंगा कभी शिकायत 
सब तो ईश्वर ही हैं, सबमें दोषों का दर्शन 
उचित नहीं है, केवल निज दोषों का दर्शन 
बहुत-बहुत है। 
किन्तु सुबह की किरणों में ही 
ऎसी कुछ मादकता होती 
भूल गया संकल्प 
और अनथक प्रपंच का सार हो गया 
दुनिया में रहते-रहते
मैं दुनिया का ही यार हो गया। 
तुम मेरे प्रभु ; भीतर जागृत 
औघर दानी 
मेरा भी उपकार करो  
मेरी ऐसी चित्त-दशा कर दो अपनी सी 
सबको प्यार करो। 

Thursday, 30 January 2014

साथ में होना

साथ में होना 
तुम्हारे 
नयन सुख है 
प्रान सुख है 
फूल खिला है। 
साथ में होना 
तुम्हारे
मिलन सुख है 
प्रणय सुख है 
फूल झरना है। 
साथ में होना 
तुम्हारे 
परम सुख है
विगत दुख है 
दीप जलना है।   

छोटी कविताएँ

१ 
धुन रहा है काल प्रतिपल 
तदापि अपनी राह चलता 
मैं उठाये बोझ कंधो पर 
व्यर्थ की ही सही मंजिल तक 
जा रहा हूँ। 
हल करूंगा जो रुकावट बन खड़ी है 
समस्याएँ जानता हूँ,
आदमी का रथ बड़ा है,
पर हवा का रुख 
बखेड़े सा खड़ा है। 

२ 
जिंदगी भी क्या कि जिसका 
सिर गायब है 
बीच में मैं क्या 
सभी उत्तर नदारत हैं 
भूख, निद्रा, सुख-दुखों का 
सिलसिला है 
जो मुझे भी अन्य लोगों की तरह 
शायद विरासत में मिला है। 

मनोरोग के बरक्स मैं

मन नहीं लगता
चिकित्साविदों की दृष्टि में
यह मानस रोग है,
कारण, निवारण करना चाहिए
पर अपने हाथ में कारण भी तो नहीं
वस्तुओं के रूप में लोग नहीं हैं
कि उन्हें अपने हिसाब से धर दिया जाय
हिटलर मैं हो नहीं सकता
कठेस धार्मिक होने से रहा,
अब बची कविता
शब्दों का शस्त्र संभाले
चला जा रहा हूँ
शाम भी होती जा रही है,
रोशनी किसी काम नहीं आ रही है।
                       
                               ( ६/११/९० )

Wednesday, 29 January 2014

ये फूल

ये फूल उनका है
उन्ही का है
गंध उनकी नहीं
सभी की है।
ये घर उनका है
उन्ही का है
राह उनकी नहीं
सभी की है।
कुछेक चीजें है
जो कि उनकी है
सभी की है
कुछेक और भी चीज़े हैं
इस जहाँ में है
वे न उनकी है
न सभी की हैं।  

सागर

आज बहुत सागर कि याद आ रही
कहतें हैं
सागर की याद
मृत्यु की सूचना है
अशुभ है
पर क्या करें सागर तो टिक गया है
स्मृति में।
सागर से मिले थे
लौट आये थे
सागर से मिलना फिर क्या हुआ
सागर से मिलना तो मिल जाना है सागर में
सागर ही हो जाना है।
अधूरी भेट याद बन सता रही है
कैसा होता है सागर
सागर की सी आँख चाहिए
कैसा निःस्वन होता है सागर का
गहरा बहुत गहरा हृदयतल चाहिए
आह हाहाकार सागर का
बुलाता है
सागर से मिले और लौट आये
अपने छोर को अछोर होने नहीं दिया
अब मैं आऊंगा सागर
तुममें मिल जाऊंगा। 

चौबीस घंटे

१ 
नींद में भी टंटा खड़ा रहता है
जिंदगी एक शब्द है
पर उसका अर्थ
चौबीस घंटे कोचता रहता है।

२ पतझर 
सड़क के किनारे के वृक्ष
पत्ते उलीच रहे हैं
हम गुजरते हुए वन हैं
रुकेंगे तो
बसन्त दुबारा नहीं आयेगा।

३ प्यार
कोई फूल एक बार महँका
गँध रह गई
न पौधा रहा न मौसम
बेचैनी तुम्हारा नाम आत्मा।

४ विद्या 
गंवारो का श्रम
अपने हक़ में
इस्तेमाल करने की शाजिश
मुक्ति मिले न मिले
भोग तो मिल ही रहा है
बिना परिश्रम के।

Tuesday, 28 January 2014

शिवराधा

जैसे ही उसने कहा
आग
वह जल गई
मैं कुछ देर तक तापता रहा
वह राख में बदल गई
बची हुई राख के कुछ कण
मैंने मस्तक पे लगाया
आज सचमुच मैंने
शिवराधा का
सम्पूर्ण फल पाया। 

फूलों के विषय में

कुछ लोग टटके फूलों की तरह खड़े हैं
शेष मुरझाये फूलों की तरह हिले हैं ,
मैंने टहनी से कहा
पत्तो से कान में मंच की तरह
बताया
इन्हे धारण किये रहो ,
जो खिलें हैं
वे भी कुछ हिले हैं
पर मुझे फूलों का मुरझाना अच्छा नहीं लगता
बागवानी का विशेष शौक नहीं
वक्त बागवानी का नहीं है
खेती-बारी का है,
उससे फसलें होती हैं
और वे काटी भी जाती हैं
हर फूलों पर ध्यान जाता है
गंध का क्या ठिकाना
अभी है
अभी हवा के साथ उड़ जायेगी।
पर फूल तो हमेशा हैं
खिलने, मुरझाने, और
तोड़े जाने, गिर जाने के पूर्व
हमेशा और हमेशा।  

पत्नी की स्मृति

तब मैं तुम्हे याद करता हूँ
जब कोई याद नहीं आता है 
पत्नी की याद 
भला कोई करता है ?
पत्नी घर में हो 
तो घर उसे याद नहीं करता 
उसी को धारण करता है 
घर दीवारों से 
भुजाओं के घेरे बनाता है क्या 
या पत्नी घर की भुजाओं में 
स्वतः चली आती है 
या कि उसी में नित्य विद्यमान रहती है। 
मैं घर की  तरह 
पत्नी को याद करता हूँ 
जो अपनी गृहस्थी की चिन्ता में 
अपने बच्चों के साथ 
अपनी आँखों और इच्छाओं के साथ 
झगड़ते हुए घर में नहीं है 
और घर उसकी प्रतीक्षा कर रहा है। 

Sunday, 26 January 2014

स्थायी खेद है

अपनी पसन्द की जिंदगी 
नहीं मिली 
तो इसमें मेरा क्या दोष है 
मैं तो जीने के लिए विवश हूँ 
जैसे मरने के लिए 
जीने और मरने की दूरी 
एक क्षण की 
शेष सब बेहतर जीने की दूरी है ,
यह नहीं मज़बूरी है। 
यह एक माया है 
जो चल रही है 
गलत है यह कथन भी 
यह एक सुख की खोज है 
जो अधूरी है 
यों तो यह खोज है 
पर यही तो खेद है कि 
यह रोज रोज है। 


रात का सन्नाटा

सुनता हूँ एकांत में 
दूर का सन्नाटा 
कोई मणिधर जैसे बाँबी में प्रवेश कर रहा हो ,
प्राण खींचते जा रहे हैं 
रात कुछ नहीं बोलती 
किवाड़ों पर टंगे परदे 
यूनान के संतो कि दाढ़ी की तरह हिलते हैं 
यहाँ से वहाँ 
समय का रथ घरघराता है 
घोड़ो की टाप मुझे सुनाई देती है 
साथी अनेक हैं 
कोई मन पसंद 
पर कौन मेरे साथ अपनी छाती पर पहाड़ रखे ,
कौन सुने यह सन्नाटा 
जो शब्दों की सेना को मौत की नींद सुला देता है। 


संसद में

संसद का बजट अधिवेशन चालू हुआ 
टकटकी लगाये थी जनता 
चीजें फलों की तरह 
बिना मौसम 
बाजार के वृक्षों पर 
लग जायेंगी 
ढेले डंडे नहीं चलेगें 
विनियम की हवाएँ 
काफी होंगी ,
हमारे झोले चीजो से भर जायेंगे। 
वित्त मंत्री 
कुबेर का स्तवन कर रहे थे 
जनता प्रसाद की आशा में सो गयी। 
सपने में देखा 
वृक्ष वहाँ नही थे ,
कुछ लोंग वहाँ थे जरुर 
पर हवाओं के बारे में कुछ नहीं बता रहे थे। 

इच्छाएँ

१-
इच्छाएँ अजगर की तरह 
पहले लपेटती हैं 
फिर पोर पोर को 
चूर चूर कर 
निगल जाती हैं। 
अस्तित्व खुशबू सा नहीं बचता 
अस्थियाँ जरुर शेष रह जाती हैं। 


२ -प्यार में 
प्यार में कूद पड़ने की इच्छा थी 
कुएँ ही प्यासे थे। 


३- आँखे 
खुबसूरत थीं 
बिना बुलाये बोलती थीं। 



ज्यादातर

जीने के मार्ग पर 
तुम्हारी स्मृतियों के पड़ाव 
ज्यादातर उदास करते हैं 
पर सोचता हूँ कि 
यदि ये पड़ाव नहीं होते 
तो रास्ता कितना लम्बा लगता 
क्यों कि मंजिले नहीं होतीं 
ज्यादातर दुनिया में 
सिर्फ रास्ते होते हैं। 

एक अनुभव यह भी

ज्यादातर आदमी पागल होतें हैं
शेष उनसे ज्यादा ही।
निर्दोष या तो बच्चे हैं
या मुर्ख।
औरतें सिर्फ प्रतीक्षा करती हैं। 

डेरा

इस दौड़ से थके 
तो रुके 
दोनों आँखे बन्द हुई 
तो तीसरा नेत्र खुल गया 
कोई तरकीब नहीं थी 
कविता में होने के अलावा 
गो इतने से कविता नहीं थी पूरी 
मैं ही था पूरा का पूरा। 
असंख्य तो नहीं 
गिनने का समय भी नहीं था 
उठ रहे थे पकड़ने को मुझे अनेक हाथ 
वे किसके थे 
नहीं जानता 
भागने का कोई उपाय नहीं था 
हम कविता को ही पुकार सकते थें 
पुकारा ,
कविता कहाँ आती है पास 
शब्द आयें तो आयें 
उनका काम है,यहाँ वहाँ भटकना 
किसी के पास रहना 
कुछ लोंग इस्तमाल के लिये होतें हैं। 
अतः मुझे प्रकृति में भागना पड़ा 
जैसी भी थी उप्लब्द्ध 
कोई चारा नहीं नहीं था 
कि मैं उसमें लीन हो जाऊँ 
प्रकृति नहीं थी मेरी विश्राम स्थली 
फिर भी मैं आखिर कहाँ जाऊँ 
कहाँ सुस्ताऊँ ?