Wednesday, 19 March 2014

होली बीत गई

जैसे सब बीतता है 
वैसे बीत गई 
एक शब्द उठा 
रंगीन फ़व्वारो पर 
रखे बैलून की तरह 
रात आते-आते 
मशीन बंद हो गई
न रंग है, न फव्वारा 
न वह बैलून 
होली मिठाइयाँ और गुजियों के 
पच गए अवसाद के स्वाद की तरह 
खत्म हो गई। 
मिल आए लोग जिनसे मिलना था 
मिल लिए लोग जो मिलने आए थे। 
समय के माथे पर 
लगा अबीर झर गया 
होली बीत गयी। 
एस एम एस पद लिखे गए 
हार्दिक शुभकामनाएँ बाजी हो गई 
उन्हें लोगो ने अपने मोबाइल से 
डिलीट कर दिया 
अब अगले साल आएगी होली 
एहसास, सुदूर समन्दर में 
चला गया.… लगा 
चुप है शहर 
उजाड़ लग रहा है गाँव 
कल अखबार भी नहीं आयेगा 
कि तुरंत याद दिला दे होली का 
अगले दिन आयेगा 
तब तक दिलचस्पी कम हो जायेगी। 
बच्चे और जवान 
दिन भर होली खेलकर 
गाकर, बजाकर, नाचकर 
बेहद थककर 
सो गये 
होली बीत गई 
होली की तरह 
जिंदगी बीत जायेगी 
एक दिन 
न मन का फव्वारा रहेगा 
न तन का बैलून 
मशीन बंद हो जायेगी 
पानी ख़त्म हो जायेगा। 
बचे हुए लोग 
बचे रह जायेंगे 
और कुछ लोग 
होली की तरह बीत जायेंगे 
चुप एक शब्द है 
हर त्योहार में 
जो उनके अवसान के 
समय आता है 
और कहता है 
मुझे देखो और पहचानो
और बीत जाने की प्रतीक्षा करो।   

Sunday, 9 March 2014

आदमी और बाकी सब

झुकी हुई औरत 
गर्दन पर बाल खोलती है 
दिख गए मर्द को देखती है 
और अंदर भाग जाती है,
औरत जब मर्द देखती है 
तो अंग छुपाती है 
मर्द जब औरत को देखता है 
तो सीना फुलाता है,
चिड़िया जब चिड़िया को देखती है 
चहचहाती है,
मैंने पेड़ से पूछा 
आप क्या करते हैं श्रीमान 
आदमी को देख कर ?
मैं देखता हूँ 
कुल्हाड़ी नहीं है न उसके पास 
और आस्वस्थ हो जाता हूँ। 


Thursday, 6 March 2014

विपत्तियों में

ढकेले रहेंगे हम विपत्तियों को 
जैसे कूड़े को अपने द्वार से बाहर कर 
कही दूर कर आते हैं झाड़ू से हम 
पर फिर वे आ जाते हैं जैसे 
वैसे आफते आही जाती हैं 
घर में,  दरवाजे पर 
दिल में और देह में। 
आदमी -आदमी के काम आता है 
इसीलिए कि हर आदमी के 
घर और बाहर विपत्तियाँ आती हैं 
सब अपनी-अपनी विपत्ति में पड़े लोग 
दूसरों की विपत्ति में 
ढाढस ऐसे बांधते हैं 
जैसे उन्हें ढाढस बध गयी हो 
मुकम्मल। 
हम जानते हैं सब 
पर जानना कितने काम का होता है 
ऐसे अवसर पर। 
हमें न जानने जैसा 
होना और बरतना 
कितना सहारा देता है 
विपत्तियों में। 

बच्चे

बच्चे आते हैं पास 
और ऐसा कोई प्रश्न करते हैं 
जो उत्तर के रूप में 
केवल बच्चे को और अधिक 
बिम्ब में बदल देते हैं 
बच्चा प्रश्न करते समय 
बच्चा नहीं होता 
पर जब भी आप बच्चे को 
प्रश्न करते देखते हैं 
तो वो बच्चा ही रहता है 
उसके छोटे-छोटे हाथ 
छोटा सा मुँह 
और छोटी-छोटी 
पगध्वनियाँ 
सयानों कि छाती में 
संगीत की तरह प्रबंध करती हैं 
बच्चा नायाब है दुनिया में 
सृजन का इससे अच्छा 
उदहारण नहीं मिलेगा 
कला की दुनिया में।  

भरोसे पर भरोसा

गैर भरोसे की दुनिया में भी 
आदमी को भरोसा करना ही पड़ेगा 
अपने हाथ पर भरोसा कि वह 
निवाले को मुँह तक ले जायेगा 
और अपने उत्सर्जन तंत्र का भरोसा 
कि वह वहिर्गमन करेगा ही 
अपने सांसों पर भरोसा 
कि वह चलेंगे 
और दिल और फेफड़े को मिलता  रहेगा 
आक्सीजन ,
रोटी ,आटे और नमक पर 
भरोसा करना पड़ेगा 
और बेवफा से बेवफा औरत पर 
यह भरोसा तो करना ही पड़ेगा 
कि यदि जनेगी तो वही जनेगी 
पुरुष जन नहीं सकता 
कोई बच्चा। 
आग पर भरोसा 
पानी पर भरोसा 
और अपने खुशियों या ग़मों पर भरोसा  
अब करना ही पड़ेगा आदमी को 
तो वह क्यों कहता रहेगा कि 
अब भरोसे के काबिल नहीं दुनिया। 

Tuesday, 4 March 2014

यह कोई प्रार्थना भी नहीं है

जीवन की सांध्य वेला में 
जिंदगी का हिसाब लगाते हुए 
कुछ याद नहीं आता 
ऐसा जो दर्ज करने लायक हो,
किसी के काम आया कि नहीं आया 
वे तो वही जानते होंगे 
पर अपने लिए जुगाड़ने में 
इज्जत की रोटी 
पूरी जिंदगी खर्च हो गयी 
चाहता तो यही था 
कि सभी को इज्जत की रोटी 
जिंदगी भर मिले 
और मरने पर 
श्रद्धांजलि 
पर ऐसा करना मेरे वश में न था। 
अब अपने आस-पास देखता हूँ 
किसी को दोष दिए बिना 
तो इतना भर कह सकता हूँ 
कोई बहुत अच्छा न लगा 
यहाँ तक कि जिससे प्रेम किया वह भी 
जिनसे खिन्न हुआ वह भी 
दुश्मनी तो किसी से नहीं पाली 
क्यों कि दुश्मन मेरे कोई स्थाई रूप से बना ही नहीं 
सभी मित्र थे 
यहाँ तक कि पेड़ और पौधे भी 
जिनसे कई मामलों में 
बात-चीत कर सका था 
जिन जीवों की जाने-अनजाने 
मुझसे हत्या हुई 
उनसे क्षमा मागने के अतिरिक्त 
मैं क्या कर सकता हूँ 
कुछ चाहिए नहीं 
बस यह दुनिया 
जीतनी भी अच्छी हो सके हो जाय 
तो चैन से मर सकूंगा 
इसके लिए ईश्वर से प्रार्थना ,यदि वह सचमुच हो।  

एक लम्बी लड़ाई

कोई नहीं सुनना चाहता सत्य 
जैसे मौत की खबर सुनकर 
अपनी मौत के होने के सच 
को टालते हुए जीवन में 
शरीक हो जाता है आदमी। 
अन्याय के प्रतिकार का 
समर्थन वह तभी तक करता है 
जबतक उससे होने वाले अन्याय 
के प्रतिकार की चर्चा न की  जाय। 
प्रेम,सहानभूति और करुणा 
सब अपने लिए चाहते हैं 
पर देने के मामले में 
समय, सुविधा और 
न्यूनतम हानि की कीमत पर। 
दुनिया को बदलने की 
इच्छा वाला आदमी 
अपने को बदलने के 
प्रायः विरुद्ध 
और यह एक ऐसा युद्ध है 
जिसे शताब्दियों तक 
लड़ा जाना है 
और इसके हथियारों की 
खोज भी इसी समाज को करना है। 

कविता नही

इच्छा इतनी नहीं कि 
किसी से भिक्षा मांगू 
घमंड भी इतना नहीं कि 
किसी की महानता के सामने 
सिर झुका सकूँ 
अब मेरे जैसे औसत 
आदमी के लिए 
कहाँ है दुनिया में गुंजाइश 
मुझे तो लगने लगा है कि 
अब कविताओं में भी 
मेरे जैसों की कोई गुंजाइश नहीं रही। 
फिर भी आप के लिए नहीं 
अपने लिए लिखता हूँ कविता 
बिना अंकित किये 
एक अलिखित ख़त की तरह 
चांदनी को 
प्रिया की स्मृति को 
और दोस्तों की 
जिंदगी को। 
ये चीजे कविता के रास्ते से नहीं 
मेरे दिल के रास्ते से आते हैं। 


कहाँ से ले आऊँ

कहने के लिए बहुत कुछ नहीं है 
हल होगी मूलभूत समस्याएं 
जबसे 
चलने के लिए था मेरे सपनों का रास्ता 
पर वह पूरी न हो सके 
क्यों कि जुड़े थे दूसरों के साथ 
वे मेरे नहीं हो सकते थे 
इसलिए हो गयी चुनौतियों के बीच,
बड़ा मुश्किल है 
जीना और मुकम्मल बने रहना
क्यों कि  
मुश्किल होती जा रही है नौकरी 
मुश्किल होता जा रहा है घर 
मुश्किल होते जा रहे हैं परिजन 
मुश्किल होती जिंदगी की 
असलियत 
बहुत मुश्किल है मोल पाना 
रोज-रोज का टटमजार 
और शायद सबसे ज्यादा 
मुश्किल है ज्ञान की सीमा 
जिस पर सबसे ज्यादा किया था 
विश्वास 
अपने सपने की प्रेमिका की तरह 
वह भी तोड़ गया मेरा दिल 
अब कहाँ से ले आऊँ जीने का विश्वास। 

Monday, 3 March 2014

अखबारी आदमी

वह चीखता ऐसे है 
जैसे छप रहा हो 
और जब हँसता है 
तो उसे मशीन से 
अखबार की तरह 
लद-लद गिरते देखा जा सकता है ,
वह इकठ्ठा होता है 
अपने वजूद में बंडल का बंडल 
सबसे आँख लड़ाती बेहया 
औरत की तरह 
वह इतना प्रसिद्द होता है कि 
दिन भर में ही 
पूरा-पूरा 
फ़ैल जाता है 
आबादी पर ,
अगले दिन वह फिर 
हंसेगा, चीखेगा, गायेगा 
फर्ज करेगा 
और दोहरायेगा, घोसणा करेगा 
आदमी अखबारी है 
अखबार में छपा रहना चाहिए 
उसका प्यार। 

साहित्य

बड़े-बड़े लोगो ने 
कहीं बड़ी-बड़ी बातें 
प्रेम अभी और करना है 
दुनिया को और अधिक बनाना है बेहतर 
प्रकृति को बचाये रखना है 
सुन्दर स्त्रियों का सौंदर्य 
और अधिक चिन्हित होना है 
और कर्म नायक 
उपजाने हैं प्रबन्धकाव्यों की खेती में 
नायिकाओं को और अधिक बनाना है 
प्रगतिशील
यथार्थवादी उपन्यासों में 
देखना है कि 
आम आदमी के पास 
अपनी सहानभूति की 
दस्तक कैसे पहुंचे,
यह एक खुला रास्ता है 
जिसमे विचारों के लिए 
थोड़ी ज्यादे जगह देनी हैं 
मस्तिष्क में। 
बड़े लोग चले गए 
माइक में बोल कर पहले 
कुछ छोटे लोग 
बटोरते रहे 
फेकें हुए प्लास्टिक के गिलास 
समेटते रहे दरियाँ 
इकठ्ठा कर लादते रहे रिक्शे पर 
सब उठ गया 
साहित्यिक जमावड़े का रेला 
फिर वह जगह रह गई 
शायद अगली गोष्ठी की प्रतीक्षा में,
एक और व्यक्ति वहाँ अभी भी था 
सोचते हुए 
एक कवि के मन की तरह 
कुछ भी तो नहीं हुआ 
कहीं कुछ दुनिया में 
जो जैसे था 
वैसे का वैसे 
इतिहास के बहार 
कोई शब्द नहीं मिल रहा था 
कि दर्ज कर लिया जाय 
और रस निर्मित की  रिक्तता में 
उन्हें वैसे रख दिया जाय कि 
साहित्य सगुण हो जाय 
भले ही कवि का मन रहे निर्गुण। 
और हाँ 
इस कविता का साहित्य सोचते हुए 
सड़क पर जा रहा था कवि 
और गली में मुड़ते ही 
कुत्ते ज्यादा भोंकते हुए उसे फिर मिल गए थे। 
 

बूढ़ा देश

बच कर निकल गई 
हाथ आई जिंदगी 
मछली जैसे पकड़ में आई-आई 
फिसल गई। 
चुप चाप मृत्यु की  प्रतीक्षा में 
बैठा बूढ़ा आदमी
कब तक नाती-पोतो का मुँह देखता रहेगा 
दवाई और रोग 
पेट की कमजोरी 
हड्डियों का कड़कड़ापन 
और अतीत का बोझ 
वर्तमान में रहने नहीं देता। 
मेरा देश एक पुराना देश है 
जिसकी आँखों में चमक 
कभी-कभी आती है।   

Sunday, 2 March 2014

कविता की आदत


इसी तरह के मौन सन्नाटे में 
जीभ को साधते रहते हैं हम 
अपारदर्शी भविष्य 
और चमकीले अतीत में 
वर्तमान ऐसे लुढकता है जैसे 
कोई पत्थर लुढक रहा हो 
और गंतव्य का पता न हो 
हमारा असली भविष्य 
हम नहीं लोग देखेंगे जो बचे रहेंगे। 
इस अपार असमझ बूझ को 
दर्ज करते रहना 
कविता की आदत है। 

चुप रहने दो मुझे

समाधि के स्वाद की तरह 
मौन के 
आस-पास शब्द 
छोटे-छोटे बच्चों की भाँति 
उधम मचाते हैं 
उन्हें देखने की चेष्टा में 
मैं असहजता का अनुभव करता हूँ ,
क्या कर सकता हूँ 
मंदिर के सामने मंगलवार के दिन 
पंक्तिबद्ध दरिद्रों ,अपंगो ,कोढ़ियों के लिए मैं 
कुछ भी तो नहीं कर सकता 
ये शब्द किस काम के हैं 
और कविता भी किस काम की  
आने वाला है जन्मदिन 
एक समाजवादी का 
मुझे वहाँ जाना है 
वह भी तो कुछ नहीं कर सकते 
इन दरिद्रों के लिए 
परमाणु डील तो होगा 
पर बिजली भी तो नहीं मिटा सकती 
भूख के विराट अन्धकार को 
जो तीसरी दुनिया के तमाम लोगो की 
पेट और छाती पर फैला है 
चुप रहने दो मुझे 
बोलने दो दुनिया को। 

मरने से कुछ नहीं मिलता

जियेंगे तो दुनिया देखेंगे 
मर गये तो क्या देखेंगे 
लोग देखेंगे 
हम तो नहीं देखेंगे 
पैसा नहीं भी रहेगा तो 
धुधली आँखे रहेंगी 
और चल नहीं पाये तो 
बैठे-बैठे देखेंगे 
जो लोग चलेंगे 
उनमे से कोई तो 
हमारे पास से गुजरेंगे। 
किसी बागीचे में फूल नहीं 
तो सामने के खाली जगह पर 
उगी घास देखेंगे 
पेड़ पर बैठे चिड़िया न बैठे 
उड़ते कौवे को देखेंगे ,
जो सुन्दर था न देख सकें 
उन्हें कूड़ा होने पर देखेंगे 
कुछ तो देखेंगे। 
आँखे नहीं बचेगी तो 
स्पर्श अनुभव करेंगे 
कान नहीं रहेंगे 
होने की हरकत महसूस करेंगे ,
हर हाल में जीना 
बेहद खूबसूरत है 
मरना बदसूरत तो नहीं है पर 
मरना तो कुछ भी नहीं देखना है। 
देखेंगे ईश्वर 
नरक 
और स्वर्ग 
जीते ही 
मरने से तो कुछ नहीं मिलता 
न ईश्वर 
न नरक 
न स्वर्ग। 

कविता की भी मुश्किलें होती हैं

कविता खटाई में पड़ जाती है 
जब जिंदगी की जीभ पर 
बहुत तीखी मिर्ची पड़ जाती है 
जैसे पाँव के नीचे गन्दा पड़ जाने से 
आदमी लगड़ाने लगता है 
कविता हकलाने लगाती है। 
प्रेम की नदियां समुद्र में नहीं पहुंचती 
और देवता की जाति में न पैदा होने के कारण 
अमृत मिल भी जाय 
तो सिर और धड़ को अलग होना पड़ता है ,
कोई भी कविता 
सच्चाई नहीं झेल सकती 
क्यों कि वह आदमी नहीं होती 
और होती भी है तो कुछ ज्यादा 
या कम। 
मेरे मित्रों 
बहुत मुश्किल है 
बहुत सी हालातों में कविता 
संवाद का अवसर 
शायद हमेशा नहीं होता 
शब्द पर्याप्त नहीं होते 
और होते भी हैं तो 
इतने ज्यादे पर्याप्त हो जाते हैं कि 
वह - वह नहीं बोलते 
जो बोलना चाहिए ,
कविता भी एक स्वीकृत मुहावरे की तरह है 
और जिंदगी पूरी की पूरी 
कभी स्वीकृत नहीं होती। 

Friday, 28 February 2014

इच्छाएँ

छोटी-छोटी इच्छाएँ 
जीवन का प्रसंग 
अविरल घोरतम इच्छाएँ 
कुछ समाधान 
संतोष, नियति, ईश्वर की मरजी 
और संयोग। 
मैं पिछली कई शताब्दियों से 
बूढ़ी माँ की कहानियों 
और बड़े बुजुर्गों की हिदायतों में 
इन शब्दों को सुन रहा हूँ ,
मैं कुछ कर नहीं सकता 
इसका तात्पर्य 
मैं इसे स्वीकार करता हूँ ,
इन शब्दों पर 
किसी का राजी होना 
सत्य नहीं हो सकता 
कभी विद्रोह 
बिलकुल असफल नहीं होता। 
उठो मेरे भीतर इच्छाओं 
तुम्हारे कारण जीवित हूँ 
और लड़ो मेरी इच्छाओं 
सामने अभेद्य पर्वत हो तो भी क्या ,
कुछ तो हो कर रहेगा 
और कुछ न हुआ तो भी क्या 
तुम तो बचे रहोगे 
जीवित। 

यह दिलासा नही है

कभी भी कम नहीं होता जीवन 
वह प्रतिक्षण बढता हुआ है 
एक एक बच्चा 
हजारों बड़ो के जीवन से 
ज्यादा समुत्सुक 
प्रकृति के रहस्य को 
जानने की कोशिश में 
कितना जीता है 
पृथ्वी पर इसका कोई हिसाब नहीं 
झरने दो पत्तो को 
वसंत में सहस्र-सहस्र 
पत्ते हरे-हरे हो जायेंगे 
मुरझाने दो फूल को 
सुबह मैदानो में 
नए-नए फूल उग जायेंगे। 
जो बचे हैं 
वे ही ज्यादा हैं 
जीवन हमेशा ज्यादा ही रहता है 
बेचारी मृत्यु की तमाम 
कोशिशों के बावजूद। 

Thursday, 27 February 2014

हारे हुए लोग बरक्स जीते हुए लोग

जीते हुए लोग 
ऊचे और ऊचे 
सिंहासनो पर 
बैठते गए 
पर देखो न चमत्कार 
बचे हुए लोग 
बहुसंख्यक थे। 
हारे हुए लोग 
खुश नहीं है अपनी हार पर 
पर इक्ट्ठा तो हैं 
और सिंहासनो पर बैठे लोगों की 
तरह उस तरह ईर्ष्या में भी नहीं हैं। 
ईर्ष्या और द्वेष 
मद और मत्सर 
हमेशा जीते हुए लोगों में ज्यादा होता है 
क्यों कि वे इक्ट्ठे नहीं होते 
हारे हुए लोग 
एक साथ होते हैं हर हार के बाद 
और थोड़े समय का दुख 
मनाने के बाद 
वे हमेशा आपस में डूब जाते हैं। 

स्वयं सिद्ध कुछ नहीं

स्वयं सिद्ध कुछ नहीं 
न आग 
न पानी 
न पेड़ 
न फल 
न लोटा 
न गिलास 
यहाँ तक कि जीना और मरना 
कुछ भी स्वयं सिद्ध नहीं है 
मरने के लिए भी जीना पड़ता है 
और आग को जलाना 
पानी को पीना 
फल को खाना 
लोटे को उठाना 
और गिलास को ओठों से लगाना पड़ता है ,
तुम कहते हो 
ईश्वर स्वयं सिद्ध है 
उसे भी धरती पर आना पड़ता है 
या आकाश में रहना पड़ता है 
हवाओं को प्रेरित 
सूर्य को प्रकाशित 
और पर्वतों, जंगलों और 
जाने कितने प्राणियों 
वनस्पतियों को रवाना पड़ता है ,
सब लगे रहते हैं 
जीवन का व्याकरण 
कभी स्वयं सिद्ध नहीं होता। 

आग

मैंने कहा
आग
मुझे याद नहीं
वह कब जली थी
मेरे जन्म के समय शायद ढिबरी थी,
थोड़ा बड़ा होने पर
लालटेन ,बल्ब
और मरकरी ,
आग मेरे लिए रौशनी भी थी
पर ज्यादातर मेरे लिए
रोटी थी
भात, दाल, तरकारी
वह चौके में पकाती
पवित्र अग्नि
कुछ और थी।
घोर आश्चर्य
इधर उसने अपना चरित्र बदल लिया है
वह जलती है
तो किसी न किसी की हिंसा करती है
भड़क उठती है
तो पानी से नहीं बुझती ,
आग एक दिलचस्प कविता है
थोड़ी देर के लिए
पर ज्यादातर उसमें धुआ है
कड़वाहट है ,
मैं उसे जलते भी देख चुका हूँ
बुझते भी और
कभी-कभी
दोनों ही देखना चाहता हूँ एक साथ।
मेरे पिता कहते हैं
वैश्वानर
जंगल दावाग्नि
और समुद्रों से मैंने खुद नहीं पूछा
मेरे पुरखो ने पूछा था
उन्होंने कहा था बड़वाग्नि
पृथ्वी उसे जलती और बुझती
महसूस करती है
चौके और चिता की शक्ल में
महात्मा कहते हैं वासना
और सयाने कहते हैं चिंता। 
अरे आग ,
मैं तुम्हारा कृतज्ञ हूँ 
कि तुम साक्षी हो सूर्य की तरह 
चाँद तारों की तरह 
और जानता हूँ 
कि तुम मुझे भस्म भी करोगी एक दिन 
जैसे तुमने जन्म दिया था एक दिन। 







Monday, 24 February 2014

बार-बार

सत्य का गूंगापन एक बार
झूठ का धपोल शंख
बजता है बार-बार।
एक दिन कोई अच्छा सा
बुरे दिन महीनो बजो
रहते देह मन-प्राणों पर सवार।
एक जगह कहीं कोई फूल खिला
रंग और गंध से
आकर्षित करता निहाल
बाकी जगह कूड़े कतवार
करते रहते कि हम जायें
उनके पास
होता तो यही है बहुधा अनेक बार।
आदमी को औरत का इंतज़ार
औरत को मर्दों का इंतज़ार
दोनों जबतक होते हैं पास-पास
ख़त्म हो चूका होता है दोनों के
मन का इंतज़ार ,
यही हुआ है, होता रहेगा
कसकते हुए जीना
बार-बार।   

Sunday, 23 February 2014

एक नाजुक सवाल


दिल का क्या हाल है मत पूछ 
हाल बेहाल है मत पूछ ,
वक्त को तोड़ रहा रोटी सा 
साथ में दाल नही मत पूछ ,
इश्क़ में क्या मिला किया उनसे 
एक नाजुक सवाल मत पूछ। 

आम आदमी के लिए गोष्ठी में

कठिन समय में 
कठिन बातों के हल में 
बड़े और वरिष्ठ लोगों की 
बात-चीत में 
कठिनतर है कुछ सामान्य आदमी के लिए पाना। 
वे लोग आम आदमी पर 
एक विचार गोष्ठी में 
सेवारत थे। 
आम आदमी अपने घर के लिए चिंतित था 
बेटे की बेरोजगारी से परेशान 
बिटिया के ब्याह की  चिंता 
और भैंस के बीमार होने की 
आसान सी दिखने वाली समस्या से 
ग्रस्त ,
कठिन लोग और कठिन समाज के 
बीच उनके लिए हल खोज जाना था ,
किसान के लिए खेती की कीमत 
मजदूर के लिए मेहनत की  कीमत 
यह उनके जिंदगी के व्याकरण से 
बाहर की चीजे निकली ,
वे उसे अंदर लाना चाहते थें 
उनके सदृश्य होने में 
कोई जरुरत नहीं थी ,
पर वे नहीं खोज सके कोई हल 
और गोष्ठी 
अचानक समाप्त हो गयी 
अगली गोष्ठी तक।  

दूध छोड़ने वाले वैष्णव जन

मिल गए अचानक 
सत्संगी 
कहने लगे 
मैंने छोड़ दिया भोजन में 
दूध का सेवन 
और दूध से बने भोजनो का स्वाद 
लहसुन प्याज तो पहले से 
छोड़ दिया था ,
वे वैष्णव थे 
वैष्णव होने का उन्हें गर्व था ,
मैंने उनसे कहा 
कब छोड़ेंगे 
इर्ष्या और द्वेष 
लोभ और हिंसा 
कब छोड़ेंगे 
दूसरे का घर देखकर 
कुढ़ना 
और कब छोड़ेंगे 
एक छोटा सा विश्वास 
जो कभी-कभी छोड़ते हैं 
अपने से गरीब आदमी को देखकर ,
वे कुछ तैश में आ गये 
मैंने उनका संग 
थोड़ी देर तक के लिए छोड़ दिया। 
हाय मैंने तो कोशिश की थी 
पर कहाँ मिल पाया 
मुझे सत्संग। 

कितना है प्यार

रात आने से पहले 
बंद करना नहीं है दरवाजे 
क्यों कि कोई आ सकता है 
उसके आने की प्रतीक्षा है। 
नींद आने के पहले 
नहीं सोना है
क्यों कि कोई आ सकता है 
पलकों में स्वप्न बनकर 
उसके आने की प्रतीक्षा है। 
भोर होने के पहले 
नहीं जागना है 
क्यों कि रात सोती है 
साथ में 
उसकी नींद में खलल होगी। 
कितनी प्रतीक्षाएँ और 
कितने हैं सरोकार 
तय करना कठिन है 
कितना है प्यार ? 

हम भरोसेमंद लोग हैं

कैसे भरोसा छोड़ दे 
जब तक जिन्दा हैं 
जिन्दा हैं क्यों कि पृथ्वी 
हमें घेरे है 
और जब भी हम 
अपने दरबे से निकलते हैं 
सूरज बिना कीमत चुकाए 
रौशनी देता है 
हवाएँ हमारे नथुनों में 
श्वास भरती हैं 
और पेड़ों की छाया में 
धूप- दिये में 
हम बैठ जाते हैं। 
नदियां जल दे देती हैं 
और समुद्र नमक 
हमारी चूल्हे की आग 
जलकर 
हमारी रोटी पका देती है 
हमारे हाथ 
हमारे निवालो को 
हमारे मुह में 
डाल देते हैं 
हम बहुत कुछ 
बिना धन के पाते हैं। 
कोई नहीं होता जब पास 
तो सड़क के कुत्ते 
जो मुहल्ले में हैं 
हमें पहचान लेते हैं 
और पास जाने पर 
वे दुम हिलाते हैं। 
हम अभी भी जिन्दा हैं 
इस शताब्दी की खौफ से बाहर 
हमें गरीब कहा जाता है 
कुछ अमीरों की तुलना में 
हमें मालूम तो ज्यादा नही है 
पर हमारे बिना उनका भी कुछ नहीं चलता 
हम उनके कपडे धोते 
बर्तन मांजते 
और उनके बच्चों की 
परवरिश के काफी हद तक 
हिस्सेदार हैं,
हमारे भरोसे पर जब इतना 
कुछ चल रहा है 
तो हम कैसे भरोसा छोड़ दें 
किसी के कहने से 
हमें कोई शिकायत है तो 
सिर्फ इतनी कि वे हमसे काम तो लें 
पर इस काम को 
पापकर्म कहना छोड़ दें। 

Wednesday, 19 February 2014

शब्द छोटे हैं

शब्द छोटे हैं 
हमारे अर्थ लेकिन बड़े। 
शब्द सहारे 
भाव के इस देवता के सामने 
हाथ जोड़े खड़े। 
शब्द अपने पैतरे जब-जब बदलते 
अर्थ के आंसू उन्हें चुप करा देते हैं 
कुछ नहीं होता 
किसी के शब्द से 
अर्थ से होता सभी कुछ 
शब्द है निः सीम 
लेकिन अर्थ इस निः सीमता को 
आर्द्र करते हैं 
अमृत का कलश रचते हैं। 


प्यार करने के लिए

प्यार करने के लिए कुछ चाहिए 
प्यार तो कम से होना नही चाहिए 
प्यार करने के लिए कुछ चाहिए 
एक कोई और होना चाहिए। 
शब्द में तब अर्थ आता है 
जब कभी एकांत मिटता है 
और अच्छा अर्थ पाने के लिए 
तीसरा भी चाहिए, सम्पूर्ण दुनिया चाहिए। 

अमोघ प्रश्न

पीछा नहीं छोड़ती इच्छाएँ 
चाहे हम मर जायें 
इसीलिए शायद 
हम जनमते हैं बार-बार। 
शाम होने पर 
घने वृक्षों के साथ 
जब रात की पत्तियां 
हिलती हैं 
तो पूछता हूँ 
पेड़ों की जड़ों के पास जाकर 
तुम्हे क्या सताती थी
 इच्छाएँ 
पूर्व जन्म में 
क्या कोई जड़ इच्छा थी तुम्हारी 
कि तुम जड़ हो गए। 
पेड़ बोलते नहीं 
लौट आता हूँ 
अपनी माँद में 
सुबह उठकर 
टहलने जब निकलता हूँ 
एक-एक चिड़िया से 
एक-एक पेड़ से 
एक-एक कुत्ते से 
एक-एक आदमी से 
गोया कि 
दिख गए हर जीव से जंतु से
एक ही प्रश्न करता हूँ 
और कबतक तुम 
जनमते मरते रहोगे 
इसी तरह 
पीढ़ी दर पीढ़ी 
प्रश्न जितना अमोघ होता है 
उत्तर उतना कहाँ होता है अमोघ। 

नए सिरे से

नए सिरे से 
नयी बातें 
उठाओ 
जैसे गिर गए 
झोपड़े के बांस, बल्ली और छाजन को 
जमाने के लिए 
आदमी बुलाने पड़ते हैं 
वैसे अपनी इच्छाशक्ति को जगाओ 
हारे तो क्या हुआ 
जितने के लिए 
फिर से कमर बाँधो 
छाती मजबूत करो 
और निकलो एकांत के दलदल से। 
हे भाई अनंत मिश्र 
इतनी जल्दी 
कैसे हो गए उदास 
और धप से बैठ गए ,
जितनी दूर चल चुके हो 
पथ को प्रणाम करो 
और यात्रा पर निकलो। 
फिर कल होगा 
और सूर्य निकलेगा 
मनसा की नदी बहेगी 
उसमे नहाओ 
और अपने काम पर जाओ।  

तीनों पीढियो में

बाबा की गोदी में 
बैठकर बाजार घूमने निकला 
पोता, बाबा से पूछता है -
बाबा गइया सड़क पर क्यों बैठी है ?
कुत्ता नाली के पास क्यों सो रहा है ?
गइया का घर नहीं है क्या ?
कुत्ते का कोई कमरा नहीं है क्या ?
अब बाबा क्या बतायें 
कि बहुत से आदमियों के पास भी घर नहीं है 
बहुत से आदमियों के पास भी कमरा नहीं है। 
वे इसी तरह पड़े रहते हैं 
यहाँ-वहाँ 
बैठे रहते हैं 
रात को सो जाते हैं 
सड़क पर बीनते हैं जिंदगी 
और बीनते-बीनते एक दिन 
मर जाते हैं। 

Tuesday, 18 February 2014

हिंसा


जब भी इच्छाएं पूरी होती हैं 
कोई न कोई मरता है 
हिंसा होती है। 
एक चावल का दाना ही सही 
पक जाता है 
एक हरी-भरी डाल पर 
ऐठी भिन्डी 
काट दी जाती है 
और तो और 
भारी सुरक्षा के बीच 
लिपटी बेचारी प्याज 
सलाद में बदल दी जाती है ,
किसी मुर्गे के पंख नुचते हैं 
किसी बकरे का कलेजा तल दिया जाता है 
किसी भी फूल को चढ़ जाना पड़ता है 
पत्थर पर 
शंख पर 
गुथ जाना पड़ता है 
डोरे में 
जब भी किसी की इच्छा पूरी होती है 
हिंसा हो जाती है। 
मच्छरों के विरुद्ध 
चूहों के खिलाफ 
और यहाँ तक कि 
गायो, भैसो, और भेड़ों के विरुद्ध भी 
जो देते हैं स्तन्य 
या कि अपने कीमती बाल 
आदमी रोज-रोज 
हत्या करता हैं उन्हें। 
कुत्तों को सड़क पर रौद जाते हैं 
भारी वाहन 
कोई शोक सभा 
आयोजित नही होती 
कितने ही पशु 
प्राण देते हैं 
आदमी के शौक की बलिवेदी पर 
कहीं कोई शहीद स्मारक नहीं बनता। 
काट दिये जाते हैं 
भाग न पाने में मजबूर पेड़ 
और कोई संविधान 
दंड नहीं देता हत्यारों को 
ईश्वर और मनुष्य के बीच 
ऐसी है सांठ-गाँठ 
पत्ता भी नहीं हिलता 
और चलती रहती है 
व्यवस्था। 
कवियों का काव्य 
बहुत सिमित है 
भाषा का साम्राज्यवाद 
अभी भी चल रहा है। 
किस्सा कोताह 
हिंसा होती रहेगी 
दुनिया में 
जब तक हैं इच्छाएं 
आदमी की 
पशुओं की हिंसा तो 
भूख तक सिमित है 
आदमी की हिंसा 
अनंत आकाश की तरह है।

Monday, 17 February 2014

नयन

टंगे हैं नयन दो 
तुम्हारे इन प्राणों में 
याद की यह सूरत 
तस्वीर सी टंगी है। 

नये वर्ष की शुभकामना

करुणा की कोख से जनमे 
नये इसवी वर्ष 
दुनिया के लिए लाना 
अपने पिता के थोड़े से गुण 
मन की विनम्र ममता 
प्राणियों के लिए 
संगीतमय सुबह 
और उदासी सहने की शक्ति-
हर शाम। 
थोड़ी रोशनी 
थोडा खुलापन 
थोडा प्यार 
थोड़ी महक 
तुम्हारे पास बहुत कुछ है 
पर थोड़े से लोगों के लिए ही नहीं 
सब के लिए लाना 
कुछ न कुछ 
हो सके तो बहुत कुछ 
सर्वे भवन्तु सुखिनः 
सम्पूर्ण शुभकामना। 

रोशनी

रोशनी उतनी नहीं कि 
अंधों को दिखे 
अँधेरा उतना नहीं कि 
आँखों को अंधा कर दे। 

घृणा

प्यार की दुश्वारी अब बहुत 
झेल ली 
आओ अब घृणा करें ,
घृणा करे ऐसे सब लोगों से 
जो केवल अपने को 
करते हैं प्यार। 
घृणा एक शाश्वत 
हथियार है 
लड़ने का 
घृणा एक ऊँची मशाल है 
राह देखने की। 

सावन की हरियाली

अच्छा-अच्छा खा लिया 
अच्छा-अच्छा पहन लिया 
बचा-खुचा 
फटा-चिटा छोड़ दिया 
बचे हुए लोगों के लिए 
अच्छे थे लोग। 
बचे हुए लोगों ने 
लूट-पाट कर के 
छीन-झपट करके 
पा लिया, खा लिया 
फिर भी कुछ 
बचे हुए लोग 
बचे रह गए 
आशा है 
आगे भी बचे रहेंगे। 
मानवता पावन है 
सदियों से चल रही 
महिमामय जीवन में 
हरियाली सावन है। 

मेरे बच्चों

सुन्दर औरतें
अपनी सुन्दरताएं बेच रही हैं
और अच्छे गवैये अपना गला।
पहलवान अपने चट्ठे पर
उठा रहे हैं पहाड़
और पेट से निकले बच्चे
पीठ पर लादे हैं
शताब्दियों का कूड़ा यानी बस्ता।
दलाल
अपनी रोटी में नहीं
दलाली में स्वाद पा रहा है
और बदमाश
बस्ती में खैर के खिलाफ खड्गहस्त हैं
एक ठीकरा
खरबों की जिंदगी का गीत
दुनिया के टेपरिकॉर्डर पर
नही चढ़ता है ,
कभी रील ही उतार देता है ,
नदियों में चैन नहीं
पहाड़ों में मौन नहीं
वृक्ष फल बेचतें हैं
और पक्षी
मुनीमों की तरह रखते हैं हिसाब-किताब ,
मेरे समय का सूर्य
ए. सी. के बिना नहीं उगता ,
और रात रानी
महक देने के पूर्व
मुस्कान के सौदे करती है ,
मैं कहाँ हूँ
किस तबेले में ,
मेरे बच्चों तुम्हे यह दुनिया
सौपकर जाने के पूर्व
असलियत बयान कर रहा हूँ ,
किसी गलतफहमी में मत रहना ,
मैं तुम्हे वसीयत में जो
देने जा रहा हूँ
वह एक नर्क है
इसे अपना घर समझना। 

सत्य है शरीर

सत्य है शरीर 
न कपड़ा न लत्ता 
न बम्बई न कलकत्ता 
न न्यूयार्क
न वाशिंगटन 
न हवा सा मन 
न मोटर सा पर्यटन। 
सत्य है हाथ पाँव 
आँख, कान, नाक
चेहरा और दिल 
न विमान न टीवी 
न कम्प्यूटर 
न फूल, न गंध 
सत्य है जड़ 
बाद में बनता है तना 
यह समझ में तुम्हे आये 
तो समझो आदमी बना। 
  

सौदागर

उन्होंने अपना सामान अपने से 
झोले से निकाला 
और लोगों को दिखाना शुरू किया ,
यह रहा साबुन 
इससे नहायें ,
यह रहा भोजन 
इसे आप खायें ,
यह रहा घर 
ऐसा बनाये ,
ये रही मोटर 
इसमें आये जाये ,
जनता ने पूछा 
कब हम इसे पाये ?
उन्हों ने कहा 
बस आप लोग 
कीमत चुकायें। 

Sunday, 16 February 2014

मित्र

ज्यादातर मित्र मिले 
बिछड़ गये 
वे अपने प्रभाव अंकित करते रहे 
हम कागज की तरह छपते रहे 
एक प्रेस की तरह जीवन 
हमें एक पत्र की तरह निकालता रहा 
हर एक दिन। 
लोगों ने पढ़ा हमें 
और जाना हमारे मित्रों को। 

गये हुए दिन

गये दिनों की 
स्मृतियाँ हैं 
अनेक सुन्दर साहचर्यों की 
सुगन्धित वासनाएँ !
गये दिन 
रह गये दिनों को कोसते हैं 
और देह से मन से 
आदिम वृक्ष के पत्ते 
कुछ और झर जाते हैं। 

तीन मुक्तक

१ प्रेम :
पीठ पर नागिन लिटाए ,
जा रही है दूर हम से शाम.
आँख आंचल से बंधी है ,
और अधरों पर उसी का नाम.

२ पाती :
यह उदासी जेब में थी ,
हाथ में आई.
बांचने को मन हुआ ,
पर आँख भर आई.

३ चाँदनी 
चंचल मन चांदनी हजार नहीं होती है ,
आँखों में चितवन की धार नहीं होती है.
रूप के बटोही थे, साथ चले आए थे ,
वरना अब मौसमी बहार कहां होती है !

तपश्चर्या

एक मैं ही नही 
अनादि ब्रह्म भी तप रहा है 
तुम्हारे फन में 
दोपहर की तरह 
ढलता मैं 
किवाड़ो को खोल कर 
तुम्हारे पास से आने वाले 
हवा की प्रतीक्षा में 
कब से खड़ा हूँ 
दुनिया की इस पुरानी 
हवेली में। 
कितनी बरसातों 
कितने भीतो 
वर्षो के बाद 
तुम्हारे नेत्रों में आई 
थोड़ी सी अपने लिए 
चमक देखने के लिए 
कब से ज्वार भांट की तरह 
लहर रहा हूँ-विराट सागर में 
कि तुम किसी पूर्ण मासी की रात में 
सम्पूर्ण उतरोगे 
आसक्ति के मेरे 
समूचे जल में। 


भेंट होने पर

भेंट होने पर 
फूल खिल जाते हैं 
गंध मिल जाती है,
तन प्रफुल्लित। 
न भेंट हो 
तो सब कुछ उदास-उदास 
खोया-खोया लगता है,
तुम्हारे देह में क्या 
स्त्री के अतिरिक्त कुछ है,
जो मेरे प्राणों को 
हरा रखता है 
परमात्मा सा। 

Monday, 3 February 2014

बाहर निकलो

बाहर निकलो मेरे दोस्त 
समय धूप हवा पानी सा 
शहरो व गॉँवो के पेट में 
समाया है ,
भूख प्यास तृष्णा या कामना 
कितने ही रूपों में 
यहाँ वहाँ मैंने उसे 
मुँह बाये खड़ा पाया है। 
क्या करोगे तुम 
डँसने को प्रयत्न्शील नाग का 
क्या करोगे इस 
लगी हुई चौतरफा आग का ?

स्त्री

हजार आँखों वाली होती है स्त्री 
एक भेंट में 
तुम देख सकते हो 
उसकी दो आँखें 
दूसरी और तीसरी 
चौथी और पांचवी 
मुलाकातें 
यदि तुम्हारी होती गयी 
और यदि तुमने देखना जारी रखा 
तो हजार आँखे 
तुम्हे दिख जायेंगी 
किसी भी स्त्री की।  
पुरुषोत्तम  
सहस्त्रवाहु हो सकते हैं 
पर स्त्री हमेशा 
हजार आँखो वाली है 
इंद्राणी। 

देखिये

देखिये यह रात 
कैसे बीतती है 
दिन बिताना नही पड़ता 
रात के संग 
बात वैसी नही होती। 
देखिये यह लाश है 
इसे ढोना बहुत मुश्किल है 
जिंदगी के संग 
वैसी बात प्रायः नही होती। 
देखिये 
यह बात 
दर्शन की नहीं 
रोटी-नमक की है 
गजल, गीतो की नहीं 
इसको न ले और बातों की तरह 
और बातों की तरह 
यह बात शायद नही। 

अव्याकरण

न कोई इच्छा है 
न आकांक्षा 
न प्रेम 
न प्रतीक्षा 
पर अपरचित सा तुम्हारा 
मौन रहना 
सालता है। 
तुम हजारो मील मुझसे दूर रहकर क्या करोगी 
एक क्षण भी मिलोगी तो 
निपट मेरा कहीं होना 
गहन तुमको कहीं बिठा देगा 
मुझे तुमसे कुछ नहीं कहना 
सिवा इसके 
तुम मुझे भी देखकर 
सामान्य रहना सीख लो 
हमारे लिए इतना 
और कर दो 
जिस तरह तुम रह लिया करती हो खुश-खुश 
नहीं मिलने पर 
उस तरह 
तुम देख कर भी खुश रहा करो। 

मेरे भीतर

मेरे भीतर सागर गाता है 
हाहाकार नहीं है यह 
आत्मा का शोर उठा करता है 
शत-शत तरंग 
शत-शत घूर्णन 
सूरज को 
चन्द्रमा को 
पास बुलाता है। 
भीतर सब इन्द्रियाँ 
मछलियों सी दौड़ लगाये हैं 
जाने कितने रत्न छिपे हैं 
जाने कितने अभूतघर 
कितने विष के स्रोत 
मेरे भीतर सभी देवता 
सभी राक्षस 
मिलकर मंथन करते रहते हैं
विष्णु बांटते हैं अमृत 
शंकर विष पी जाता है। 

चेहरा चेहरा खिल जाय

चेहरा चेहरा फूल खिले 
तो मन को शान्ति मिले। 

मलिन उदासी हर जाय 
तो मन को शांति मिले। 

भूखे को भोजन मिल जाय 
रोगी को उपचार 
किसी दिगंबर का कपड़ा सिल जाय 
तो शान्ति मिले। 

दुखी दीन के घर में भी 
यदि महक उठे भोजन की 
पल्लिक प्रेसों पर भी 
यदि सुविधा सम्मान मिले। 

देहाती से भी कोई यदि 
ठाट-बाट का दे दे न्योता 
मधुर भाव से बाते करे 
तो मन को शान्ति मिले 

हवा, दूध, पानी, पथ 
प्राणी-प्राणी प्राप्त करे 
खाना का सामान सभी को 
श्रम से सुलभ रहे 
ऊँच-नीच का भेद मिटे 
तो मन को शान्ति मिले 

जागरण : निः शब्द

जागे कौतूहल 
छल-छल-छल भर आये 
नेत्रों में जल। 
रूप प्यासे 
हो रुआँसे 
कहाँ संध्या हम बिता आये 
चुप हुए हम खोजते अपनी जगह 
वृक्ष सोये से लगे 
धरा फैली बहुत व्यापक 
दिष्टि ओछी 
कहाँ से समाये नम 
खोलता हूँ पृष्ठ मैं 
मन की किताबों का 
बंद करता हूँ 
नहीं कोई शक 
हिलता सास लेता। 
यह जागरण निः शब्द 

Sunday, 2 February 2014

रह गए अन्तः करण में

मैंने मोगरे का फूल नहीं देखा 
उसे मैंने ओठों की तरह 
प्रेम की किताबों में देखा है 
मैंने गुलाब के फूल देखे हैं 
तुम्हारे ओठों की तरह 
मुस्कुराते हुए फिर 
आखों से झरते हुए 
पढ़े हुए 
देखे हुए 
दोनों ही फूल थे 
देखे गए 
पढ़े गए 
झर गए 
रह गए तो केवल तुम्हारे ऒठ 
अन्तः करण में 
प्रतीक्षित चुम्बन की तरह। 

चिंता मुझे उनकी है

अपनी ही बनायी दुनिया 
घेरती है चारो ओर से 
लगाती है कांटे नागफनी 
ऊँची चहारदीवारी 
जड़ती  है सीसे 
गेट बनाकर 
हथियार बंद संतरी बैठा देती है। 
भागोगे तो कैसे तुम 
अपाहिज पहले कर रखा है उसने 
टुकुर-टुकुर देखो 
घेरे में बैठकर आकाश 
घेरे के अंदर 
लगे पेड़ पौधे 
फूल पत्ते
रंग बदरंग होते इट पत्थर। 
मेरा तो जीवन पहले से ही आकाश था 
भविष्य में भी आकाश रहेगा 
चिंता उनकी है 
जो उगा रहे हैं नागफनी 
घेरे लगा रहे हैं यथाशक्ति 
सबको 
अपना समय इसी बंधन को 
किये जा रहे हैं समर्पित।